Monday, 7 June 2010

एसी के नीचे वालि खिड़की



इस भाग दौड़ भरी जिंदगी से जूझता ,
पूरा दिन तपती धुप ,
सुलगती सडको से होकर ,
में कुछ चैन की सांस लेने ,
अपने घर पहुंचा
दो दिन की छुट्टी है,
घर पे आराम करूँगा
अपने कमरे में गया
एसी चलाया
और चैन से लेट गया
गर्मी का तो एहसास ही नहीं बचा
पता ही नहीं चला कब नींद आ गयी
शाम को आँख खुली तो
हाथ में चाय का कप लेकर
अपने एसी के नीचे वाली खिड़की के
पास बैठ गया
एसी के नीचे वाली खिड़की से
पास की बस्ती दिखाई देती है
वहां बहुत से परिवार अभी भी
गर्मी से झुलस रहे हैं
में एसी वाली खिड़की
के नीचे से देख रहा हूँ
सामने सड़क पर
पास की बस्ती के बच्चे
झूम रहे हैं
बाहर बारिश हो रही है
कोई पानी पे छप - छप करता
तो कोई छलांग मार रहा है
कोई पानी में कलाबाजी दिखा रहा है
तो कोई दौड़ लगा रहा है
कुछ बच्चे हमारी बिल्डिंग के
चौकीदार को चिड़ा रहे हैं
उसे नाच नाच कर दिखा रहे हैं
सुलगती सड़क , झुलसती धुप से
चैन पाने का रास्ता सब ने ढूंढ लिया है
बारिश तेज हो गयी है
और में अब भी
अपने एसी के नीचे वाली खिड़की से
उन्हें देख रहा हूँ ।


मधुर त्यागी